तमन्ना लीए,,,,

ढुंढ ले ये मुशाफीर शायद
कोई अपना मील जाये
जाने कीस गली मे कोई
तुझे ढुंढते तेरा अपना मील जाये
जीते है सभी यहाँ पर
पन्नो की लकीरो पर
क्या जाने कौन सा पन्ना
यु कब आखिरी बन जाये
ढुढं ले,,,,,,,,,
कौन अपना, ,,,,,
बडी बेरहम सी है जिन्दगी्
टुकको मे बटी है ख्वाहिशे
आरजुओ की तमन्ना लीए
फीरता रहा दर बदर
मीला ना कोई यहाँ
इस दौर का फसाना
ढुंढ ले ये,,,,,,,,
कोई अपना,,,,,,,

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ठीठूरता बदन,,,,,

यु बड़े मकान महलो की शान
पास मे ही था आलीशान
पुश की ठंडी हवा की शनशनाहट
एक जान थी जमीन पर लेटी
था छोटा सा एक कपडे का टुकडा
उसके बदन पर अधुरा लीपटा
चरमराती सी साॅसो का संगम
रास्तो से गुजरता भीड की दुनिया
मंद ऑखो से देखता रहा वो सबको
ठीठूरता बदन से कापता रहा वो
देखी ना कभी ऐसी खुदाई
यु बडा मकान, ,,,,,,
पास मे ही था,,,,,,,,
रोटी का एक टुकडा था पास मे
कुत्ते भी थे उसी आश मे
रात बढती गई ओश की चादर से
अब तो भीड़ भी कम हो चली
काफिला भी हट चुका था
वो बेजान पलकों से व्या कर रहा था
अंतिम साॅसो का चलना
हर पल उसकी थम गई
यु बडे,,,,,,,,,
पास मे ही,,,,,

लकीरे,,,,,,,,,,

इन लकीरो की रेखाएँ कौन जाने
कौन यहाॅ कीस को पहचाने
यहाँ तो आलम ये है की
झुर्रियाँ की आहट आती है
नफरत की बनीं जंजीरो से
मीट जायेगे लेकीन यहाँ
मीठे बोल नही पायेगें
क्या पता समय का रूख कब
कीधर जा कर मुड जाये
ये मुशाफीर ढुंढ ले खुद को
पल को ना छोड तु कही
हर लम्हा तेरा है,,,,,,,
इन लकीरो,,,,,,,,,
कौन यहाँ,,,,,,,,,

बह जाने दे,,,,

धुप के परदे कभी छाव तक आकर
हर गली मे दीप यु कभी जलाकर
सोचती है तेरी मायुसीयत की सायं
जाने कौन सी गली मे मुड जाये
पैमाने पैमाने की चाहत तुझे यु
मुझ तक खीच लाये,,,,,,,,
रंजीसो की बुनती हुई तना बना
पीघलती हुई मन का मोम सा
बह जाने दे कीसी दरीया सा
धुप के,,,,,,,,,,,

पानी की बुंदे

सावली सी थी वो
थोडी बावरि सी थी वो

चचंल मन की शोख अदा
हवा से बाते लहरो संग तैरना
ऑखो मे चमक उस नजर की
बाते है अभी उस पहर की
टुटी जो इस कदर तक
तन्हाइयो से गोता लगाती
सीखती सीखाती पलो को
देखती है उस पहर को
अपनी धीमी ऑखो से
पानी की बुंदे है छलकती
होने की चाहत मन मे
यु पल पल है पनपती

सावली सी थी वो
थोडी बावरि सी थी वो

वादीयो की लहरे,,,,,

देखा उन वादीयो की हसीन लम्हो को
जो कभी तेरे ऑखो की नुर से देखा था

मीले उन रास्तो से जहाँ तेरे नीशान अभी थे
थम गई थी सांसे यु रूक गई थी धडकन

हवा की सरसराती लहरे आकर यु कानो तक
दस्तक देती कीरण की लालिमा यु गालो तक

है तु बसा उन वादीयो की कशीश मे
गीत है सुनाता यु मधम मधम

देखा उन,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जो कभी ,,,,,,,,,,,,,,,,,

जिन्दगी के पन्ने, ,,,

ऐ जिन्दगी क्या है
तेरे पन्नों की लीखावट
खुद तुझे मालुम नही
घडी दो घडी की बाते
यु होती है अपनो की बाते
हाथो का साथी राहो मे
कही यु दपॆण सा टुटता
मंजिल की चाह मे यु
अंधेरे गलीयो मे भटकना
दर्द को होठो पर लाकर
यु मुस्कुराहटो के धागो से
हॅसकर कुछ यु सील देना
उम॔ कट जाती तन्हाई के
घनी सायो मे उलझकर
कब क्या कैसे क्यो
ये होता है जाने क्यो
ऐ जिन्दगी, ,,,,,
तेरे पन्नों, ,,,,,,