Magnetic power,,,,,,,

Hii friends,
Now days going on very criticall situation.every person have many type of problem created.but i cant say that after the one problem solve again will not be come back.becoz it is life & problem part of life.but we know that god is everywhere & god give us gift like nature. It is most important.
‘ Firstly thought ‘
Thought creating magnet in self surround .
Its very big matter becoz it help to
Achievements of that dreams.then we cant
Forget our positive thought.
Friends believe me & apply it.your life will be become change……..but firstly believe yourself.you can do everything, ,,,,,,,,,,,,,,,,”.

बहती धारा,,,,,,,,,,

बहती धारा थी वो नीम॔ल सी
हर पहर से अगडाई लेती
फीरती थी लहरो की चाल मे
एक आरजु की तमन्ना लीए
चदं लम्हो के खातिर यु
जा गीरी सागर की आगोश मे
समर्पित कर रूह अपना
तरासने चली मोती का खजाना
उसे खबर कहाँ थी उस बर्बादी का
जशन ऐ तुफान काली घटा का
जुदा हुए दो पक्षी तमन्नाओ का
रेत मे लिपटी उनकी नीशान
हर ज॔रे की बस यही कहानी
मीट ना पाये यादो की किस्त
तेरे दामन का साथ यु लहरो मे
सदा के लीए यु डुब गया
है याद शाहीलो के फसाने मे
उगता सूरज डुबता सूरज
तेरा चेहरे का है आईना
कट रही बस जिन्दगी की धारा
बीन मौज भरी रवानगी
बहती धारा,,,,,,,,,,
हर पहर से,,,,,,,,,

तमन्ना लीए,,,,

ढुंढ ले ये मुशाफीर शायद
कोई अपना मील जाये
जाने कीस गली मे कोई
तुझे ढुंढते तेरा अपना मील जाये
जीते है सभी यहाँ पर
पन्नो की लकीरो पर
क्या जाने कौन सा पन्ना
यु कब आखिरी बन जाये
ढुढं ले,,,,,,,,,
कौन अपना, ,,,,,
बडी बेरहम सी है जिन्दगी्
टुकको मे बटी है ख्वाहिशे
आरजुओ की तमन्ना लीए
फीरता रहा दर बदर
मीला ना कोई यहाँ
इस दौर का फसाना
ढुंढ ले ये,,,,,,,,
कोई अपना,,,,,,,

ठीठूरता बदन,,,,,

यु बड़े मकान महलो की शान
पास मे ही था आलीशान
पुश की ठंडी हवा की शनशनाहट
एक जान थी जमीन पर लेटी
था छोटा सा एक कपडे का टुकडा
उसके बदन पर अधुरा लीपटा
चरमराती सी साॅसो का संगम
रास्तो से गुजरता भीड की दुनिया
मंद ऑखो से देखता रहा वो सबको
ठीठूरता बदन से कापता रहा वो
देखी ना कभी ऐसी खुदाई
यु बडा मकान, ,,,,,,
पास मे ही था,,,,,,,,
रोटी का एक टुकडा था पास मे
कुत्ते भी थे उसी आश मे
रात बढती गई ओश की चादर से
अब तो भीड़ भी कम हो चली
काफिला भी हट चुका था
वो बेजान पलकों से व्या कर रहा था
अंतिम साॅसो का चलना
हर पल उसकी थम गई
यु बडे,,,,,,,,,
पास मे ही,,,,,

लकीरे,,,,,,,,,,

इन लकीरो की रेखाएँ कौन जाने
कौन यहाॅ कीस को पहचाने
यहाँ तो आलम ये है की
झुर्रियाँ की आहट आती है
नफरत की बनीं जंजीरो से
मीट जायेगे लेकीन यहाँ
मीठे बोल नही पायेगें
क्या पता समय का रूख कब
कीधर जा कर मुड जाये
ये मुशाफीर ढुंढ ले खुद को
पल को ना छोड तु कही
हर लम्हा तेरा है,,,,,,,
इन लकीरो,,,,,,,,,
कौन यहाँ,,,,,,,,,

बह जाने दे,,,,

धुप के परदे कभी छाव तक आकर
हर गली मे दीप यु कभी जलाकर
सोचती है तेरी मायुसीयत की सायं
जाने कौन सी गली मे मुड जाये
पैमाने पैमाने की चाहत तुझे यु
मुझ तक खीच लाये,,,,,,,,
रंजीसो की बुनती हुई तना बना
पीघलती हुई मन का मोम सा
बह जाने दे कीसी दरीया सा
धुप के,,,,,,,,,,,

पानी की बुंदे

सावली सी थी वो
थोडी बावरि सी थी वो

चचंल मन की शोख अदा
हवा से बाते लहरो संग तैरना
ऑखो मे चमक उस नजर की
बाते है अभी उस पहर की
टुटी जो इस कदर तक
तन्हाइयो से गोता लगाती
सीखती सीखाती पलो को
देखती है उस पहर को
अपनी धीमी ऑखो से
पानी की बुंदे है छलकती
होने की चाहत मन मे
यु पल पल है पनपती

सावली सी थी वो
थोडी बावरि सी थी वो